एक अनुत्तरित सवाल जो हरेक शिवरात्रि पर पूछा जाता है .

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  • Thursday, March 3, 2011
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • दृष्टिकोण ब्लॉग वाले भाई ने एक मुद्दा उठाया 
    लेकिन किसी के पास भी उनके सवाल का जवाब न निकला ?
    उन्होंने पूछा था कि  

    क्या लिंग पूजन भारतीय संस्कृति है ?

               आज 'शिवरात्री' है। एक ऐसे भगवान की पूजा आराधना का दिन जिसे आदि शक्ति माना जाता है, जिसकी तीन आँखें हैं और जब वह मध्य कपाल में स्थित अपनी तीसरी आँख खोलता है तो दुनिया में प्रलय आ जाता है। इस भगवान का रूप बड़ा विचित्र है। शरीर पर मसान की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटा में गंगा नदी तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को उन्होंने अपना वाहन बना रखा है।
              भारत में तैतीस करोड़ देवी देवता हैं, मगर यह देव अनोखा है। सभी देवताओं का मस्तक पूजा जाता है, चरण पूजे जाते हैं, परन्तु इस देवता का 'लिंग' पूजा जाता है। बच्चेबूढ़ेनौजवान, स्त्रीपुरुष, सभी बिना किसी शर्म लिहाज़ के , योनी एवं लिंग की एक अत्यंत गुप्त गतिविधि को याद दिलाते इस मूर्तिशिल्प को पूरी श्रद्धा से पूजते हैं और उपवास भी रखते हैं।
              यह भगवान जिसकी बारात में भूतप्रेतपिशाचों जैसी काल्पनिक शक्तियाँ शामिल होती हैं, एक ऐसा शक्तिशाली देवता जो अपनी अर्धांगिनी के साथ एक हज़ार वर्षों तक संभोग करता है और जिसके वीर्य स्खलन से हिमालय पर्वत का निर्माण हो जाता है। एक ऐसा भगवान जो चढ़ावे में भाँगधतूरा पसंद करता है और विष पीकर नीलकण्ठ कहलाता है। ओफ्फोऔर भी न जाने क्याक्या विचित्र बातें इस भगवान के बारे में प्रचलित हैं जिन्हें सुनजानकर भी हमारे देश के लोग पूरी श्रद्धा से इस तथाकथित शक्ति की उपासना में लगे रहते है।
              हमारी पुरा कथाओं में इस तरह के बहुत से अदृभुत चरित्र और उनसे संबधित अदृभुत कहानियाँ है जिन्हें पढ़कर हमारे पुरखों की कल्पना शक्ति पर आश्चर्य होता है। सारी दुनिया ही में एक समय विशेष में ऐसी फेंटेसियाँ लिखी गईं जिनमें वैज्ञानिक तथ्यों से परे कल्पनातीत पात्रों, घटनाओं के साथ रोचक कथाओं का तानाबाना बुना गया है। सभी देशों में लोग सामंती युग की इन कथाओं को सुनसुनकर ही बड़े हुए हैं जो वैज्ञानिक चिंतन के अभाव में बेसिर पैर की मगर रोचक हैं। परन्तु, कथाकहानियों के पात्रों को जिस तरह से हमारे देश में देवत्व प्रदान किया गया है, अतीत के कल्पना संसार को ईश्वर की माया के रूप में अपना अंधविश्वास बनाया गया है, वैसा दुनिया के दूसरे किसी देश में नहीं देखा जाता। अंधविश्वास किसी न किसी रूप में हर देश में मौजूद है मगर भारत में जिस तरह से विज्ञान को ताक पर रखकर अंधविश्वासों को पारायण, जपतप, व्रतत्योहारों के रूप में किया जाता है यह बेहद दयनीय और क्षोभनीय है।
              देश की आज़ादी के समय गाँधी के तथाकथित 'सत्य' का ध्यान इस तरफ बिल्कुल नहीं गया। नेहरू से लेकर देश की प्रत्येक सरकार ने विज्ञान के प्रचार-प्रसार, शिक्षा और भारतीय जनमानस के बौद्धिक विकास में किस भयानक स्तर की लापरवाही बरती है, वह इन सब कर्मकांडों में जनमानस की, दिमाग ताक पर रखकर की जा रही गंभीरतापूर्ण भागीदारी से पता चलता है। आम जनसाधारण ही नहीं पढ़े लिखे शिक्षित दीक्षित लोग भी जिस तरह से आँख मूँदकर 'शिवलिंग' को भगवान मानकर उसकी आराधना में लीन दिखाई देते हैं, वह सब देखकर इस देश की हालत पर बहुत तरस आता है।
              यह भारतीय संस्कृति है! अंधविश्वासों का पारायण भारतीय संस्कृति है ! वे तथाकथित शक्तियाँ, जिन्होंने तथाकथित रूप से विश्व रचा, जो वस्तुगत रूप से अस्तित्व में ही नहीं हैं, उनकी पूजा-उपासना भारतीय संस्कृति है! जो लिंग 'मूत्रोत्तसर्जन' अथवा 'कामवासना' एवं 'संतानोत्पत्ति' के अलावा किसी काम का नही, उसकी आराधना, पूजन, नमन भारतीय संस्कृति है?
              चिंता का विषय है !! कब भारतीय जनमानस सही वैज्ञानिक चिंतन दृष्टि सम्पन्न होगा !! कब वह सृष्टी में अपने अस्तित्व के सही कारण जान पाएगा!! कब वह इस सृष्टि से काल्पनिक शक्तियों को पदच्यूत कर अपनी वास्तविक शक्ति से संवार पाएगा ?

    22 comments:

    Dr. shyam gupta said...

    ----हा..हा...हा...अरे भई, क्या...'मूत्रोत्तसर्जन' 'कामवासना' एवं 'संतानोत्पत्ति' के बिना दुनिया में किसी का काम चल सकता है क्या, क्या इससे भी बडा कोई वैग्यानिक तथ्य होसकता है , शिव और शक्ति/,विचार/क्रिया,ग्यान/कर्म,potancial/energy के अलावा भी दुनिया में कुछ है क्या...---इतने महत्वपूर्ण तत्व की पूजा न की जाय तो किस की जाय...किसी पत्थर की...
    ---सिर्फ़ भारत में ही नहीं दुनिया में अन्य स्थानोंपर भी लिन्ग पूजा किसी न किसी रूप में होती है...
    ---गान्धी-नेहरू अच्छी तरह से शिव को समझते थे
    ---भोले का यह रूप समझने के लिये मेरे ब्लोग...श्याम स्म्रिति...पर महाशिवरात्रि पोस्ट पढिये...पूरी शिव-व्याख्या समझने में तो पूरा जीवन लग जायगा...

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ डा. श्याम गुप्ता जी ! आप भी न , बस अपना मन पहले ही बना लेते हैं समर्थन का और तर्क फिर उल्टा सीधा देते हैं ।
    काम तो हमारा गुदा और रीढ़ की हड्डी के बिना भी नहीं चलता लेकिन उनकी पूजा तो आप नहीं करते ।

    Dr. shyam gupta said...

    गुदा.. रीढ , हड्डी तो सब...लिन्ग के कलाप के बाद ही आती है. मूल को ही पूजा जाता है...आगे शाखाओं को नहीं....

    किलर झपाटा said...
    This comment has been removed by a blog administrator.
    अहसास की परतें - समीक्षा said...

    जमाल हमारे मध्य कई विसंगतिया हो सकती हैं, पर हम उन सब पर स्वयं विचार करने मे समर्थ हैं तुमको उस पर अपनी विशेष टिप्पणी देने का अधिकार नही है, और अगर तुम सिर्फ इसी लिए इसको लिख रहे हो क्योंकि एक हिन्दु ने इसे लिखा है तो मैं भी senetic verses के अध्याय यहां रखना प्रारम्भ करूंगा, आखिर उसे भी तो एक मुस्लिम ने ही रखा है, उस पर हमारे प्रश्न झेलना।

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ भाई समीक्षा सिंह जी ! आपको यहां सौदेबाज़ी की भाषा बोलने के लिए नहीं लाया गया है बल्कि विरोध के लिए ही लाया गया है। आप जिस बात को भी ग़लत समझें, उसका भरपूर विरोध करें, चाहे वह हिन्दू हो या फिर मुस्लिम हो। ग़लत बात हरेक की ग़लत होती है।
    कृपया अपनी भाषा को संयत रखें ताकि आपके विचारों से ज़्यादा से ज़्यादा लोग लाभान्वित हो सकें। मैं आपकी मदद करना चाहता हूं। अतः आप भी हिंदी ब्लागर्स फ़ोरम इंटरनेशनल के नियमों की अवहेलना से बचें।
    धन्यवाद।

    अहसास की परतें - समीक्षा said...

    मै सौदेबाजी की भाषा नही बोल रहा, मै सिर्फ तुम्हे बता रहा हूँ कि अगर बात निकली दूर तलक जाएगी इस्लिए सावधान, बाद मे मत कहना कि मैने चेताया नही था।

    रही बात संयत भाषा की - तो जिस पोस्ट के लिए तुम बोल रहे हो, उस पोस्ट मे परोक्ष रूप से सभी काम काजी महिलाओं पर लांक्षन लगाता है, ऐसे मे उसको बादित न करना य्ह दर्शाता है कि तुम भी महिलाओं के बारे मे तुच्क्ष विचार रखते हो

    Dr. shyam gupta said...

    -सही कह रहे हैं समीक्षा जी---किसी भी भांति-परोक्ष या अपरोक्ष में--दूसरे के धर्म की कमी बताना ही गैर नियम है, असंवैधानिक भाषा है, अभद्रता है इससे बचना चाहिये...अन्यथा विवाद तो फ़ैलेगा ही....

    ROHIT said...

    जमालगोटे
    बेटा शिव जी की उत्पत्ति कैसे हुयी बता सकते हो.
    जो पैदा ही नही हुआ ?उसका लिँग कैसे हो सकता है
    बेटा लिँग तो मनुष्यो का होता है .
    आत्मा का नही और शिव जी तो परमात्मा है
    शिवलिँग का मतलब इस ब्रम्हान्ड से है शक्ति से है.
    लेकिन तुम्हे ये सब बाते नही समझ मे आयेँगी
    क्यो कि तुम लोगो की पूरी जिँदगी लिँग और योनि मे ही बीतती है.
    तो भाई जहाँ लिँग नाम सुना तो एक ही चीज याद आ जाती है तुमको.
    तुम्हारी गलती नही है तुम्हारी परवरिश ही ऐसी है तुम्हारा धर्म ही ऐसा है
    मुझे तुमसे सहानभूति है

    योगेन्द्र पाल said...

    इस तरह के लेख अनवर जमाल ही लिख सकते हैं और उद्देश्य विहीन एसोसिएशनों पर ही यह लेख प्रकाशित हो सकते हैं जिसके कर्ता-धर्ता को समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का बोध ना हो

    सिर्फ एसोसिएशन बना कर दूसरे धर्मों पर कीचड उछालने का कार्य करते रहते हैं

    Namaskar Meditation said...

    थोडा अश्लीन होगा मेरा यह लेख रखना है तो रखना नहीं तो निकल देना |
    लिंग - योनी
    जो लिंग 'मूत्रोत्तसर्जन' अथवा 'कामवासना' एवं 'संतानोत्पत्ति' के अलावा किसी काम का नही, उसकी आराधना, पूजन, नमन भारतीय संस्कृति है ?
    यह आपके ही शब्दों में आपका उत्तर है |
    बिना लिंग और योनी के मूत्र नहीं निकलता है |
    जिसका मूत्र नहीं निकलता हैं तो उस आदमी की हालत आपने देखि होगी कैसी होती है |
    वह चाहता है की किसी भी तरह मूत्र इस शारीर से बहार जाए |
    और डायाबीटीस का मरीज़ तो इस मूत्र विसर्जन की बीमारी से बड़ा ही परेशान रहता है |
    क्यूंकि उसने अपने अपने लिंग पर काबू नहीं रखा और बहुत भोग किया |
    भोग करने से रोग होता है यह तो जग प्रसिद्द है |
    और भोग भी इसी लिंग और योनी से किया जाता है |
    बिना लिंग और योनी के भोग का आनंद लिया ही नहीं जा सकता है |
    जिसको भी अगर भोग का आनंद लेना है तो उसके पास लिंग और योनी होनी चाहिए |
    तो फिर जो वस्तु हमारे लिए आनंद के द्वार खोल रही है तो फिर उसको पूजा क्यूँ न जाए |
    इसी भोग से तो स्त्रियों को तीनों लोक के दर्शन हो जाते हैं और पुरुष तो एक हाल्केपन का अहसाश होता है |
    तभी तो भोग इस संसार में इतना होता है |
    रही बात संतान उत्त्पत्ति की तो सारी प्रकृति इस सम्भोग से तो संतान की उत्त्पत्ति करती है |
    बिना संतान के यह जगत कैसे चलेगा आगे बढेगा |
    और जो वस्तु किसी को जन्म देने का कारण बने तो फिर उसकी पूजा क्यूँ न की जाए |
    अब यह दोनों लिंग और योनी ही तो है इस संसार को आगे बढाने वाली तो फिर हमको इसका पूजन क्यूँ नहीं करना चाहिए |
    लिंग पूजन के रहस्य को जो जानता है वह लिंग की पूजा करता ही है |
    जहाँ तक बात है की शिव लिंग की पूजा किस तरह शुरू हुए तो उसकी एक कहानी है |
    जब शिवजी सती के वियोग में नंग-धडंग घूम रहे थे तो उनका बड़ा सा लिंग भी झूल रहा था |
    तो उस समय की स्त्रियाँ इस लिंग को देख कर सोच रही थी की ऐसा ही लिंग मेरे पति का हो |
    तो उस समय के लोगों शिवजी का लिंग काट दिया |
    और तब से फिर हर स्त्री शिव जी के लिंग की पूजा इसलिए करती है |
    की मेरे को ऐसा पति मिले जिसका लिंग शिवजी के लिंग की तरह बड़ा हो और जो देर तक भोग कर सके |
    जैसे शिव जी ने देर तक भोग किया था |
    यह हर स्त्री की चाहत होती है |
    तभी तो उन्ही स्त्रियों की चाहत को पूरा करने के लिए हर चिकत्सा - इलाज़ दवा बनाता है |
    और विज्ञापन देता है की शादी से पहले और शादी के बाद मिले | आप नामर्द नहीं रहेंगे |
    इस संसार में दो ही चीजें प्रधान है - एक समभोग और दुसरे समाधी |
    यहाँ हर स्त्री चाहती है की उसे बढ़िया से समभोग करने वाला पति मिले |
    और हर पुरुष चाहता है की उसे समाधी की उपलब्धि जल्दी हो जाए |
    इसलिए स्त्रियाँ सम्भोग करने के लिए हमेशा लालायित रहती हैं |
    और पुरुष समाधी लगाने के गुरु सीखने के लिए गुरु की तलाश करते रहते हैं |
    कभी सुना है की स्त्री ने समाधी लगा ली |
    पुरुषों की समाधी के बारे में तो बहुत सुना होगा |
    कारण साफ़ है पुरुष अपनी शक्ति को बचाना चाहता है |
    और स्त्री उसकी शक्ति को पाना चाहती है |
    इसलिए स्त्री किसी भी शक्तिवान पुरुष को देखती है तो वह कामातुर जल्दी हो जाती है |
    और फिर उस पुरुष की शक्ति को अपने में समां कर उस पुरुष को शक्ति हीन करके दुसरे पुरुष की वाट जोहती है |
    यही संसार की रीत है |
    इसलिए इतनी स्त्रियाँ वैश्या बनती है और पुरुष साधू बन जाते हैं |
    इस संसार में इस लिंग और योनी से जुडी एक और इन्द्री होती है वह है जीभ का स्वाद |
    अगर आदमी अपनी जीभ पर विजय पा लेता है तो फिर वह इस संसार में अपने आपको बचा कर रख लेगा |
    और समाधी की और जाएगा नहीं तो फिर सम्भोग है ही |
    यही दो विषय तो ओशो रजनीश को कहाँ से कहाँ पंहुचा गए |
    तो यहाँ यह स्पस्ट हो गया की जो वस्तु (लिंग और योगी) हमें सम्भोग और समाधी दोनों का आनंद देती है तो फिर उसकी पूजा करने में क्या हर्ज़ है |

    Maahi said...

    ha ha...
    haay re roodhi hindustaani...

    kisi ne sach bolna chaha to bas marne lage patthar usko, dene lage galiyaan usko...

    Anvar ji mere khayal se aap sachchai btana chahte they... pr tareeka thoda galat chuna aapne..

    ye hindu log kabhi seedhi baat sunna hi nahi pasand karte.

    inhe bas ye bol do ki aisa hota hai beta to bas hota hai... kyon hota hai kisi ne janne ki koshish hi nahi karni...

    THE AJAY said...

    anwar भाईसाहब का विरोध करना बेकार है, हमको स्वयं को सुधार कर अपनी हिन्दू सभ्यता की विज्ञानिकता को वापस लाना चाहिए और तब सबको बताना चाहिए की हिन्दू सभ्यता कितनी विज्ञानिक थी और शिव विज्ञानिकों के अग्रेसर जिन्होंने साधुओ को साधना करना सिखाया पर आज कल साधना का अर्थ एक पैर पर खड़े रह कर चार शब्द कहने को समझा जाता है जबकि वोह किसी विषय पर कई वर्षो तक अनुसन्धान और शोध करना होता था.

    पर पहले तोह हिन्दुओं को एकता रखनी सीखनी चाहिए..

    Aashish Verma said...

    Hindu Muslim! he he he lol..... Shame on you! Hindu kisi bhi sanatan dharam ki holy kitab mein likha nhi paya jata! Only the word Sanatan Dharma is there! Dr.Shyam ka gyan bhut kum. Anwar bhai ka dimag vaise hi kharab hai........ But you are both interested that is good thing.... Please read Shiv Puran to know about Lord Shiva. Jyoti Lingam means the "Mark or Symbol of God in Jyoti Swaroop" which Sada Shiv show to Vishnu and Bramha to destroy there ego.... So if u want to know go through that

    Aashish Verma said...

    Ling is ambiguous word which have many meaning. Dear Anwar and Mahi and Shyam and respected Ajay...... Its not about religion at all. Please all you read "SHIV MAHA PURAN" to know your answer.... Shiv Ling full form is "Shiva Jyoti Lingam" mean "Symbol of one GOD"...... Bhagvan Shiv ne Bhrama ji or Vishnu Bhagvan ka Ahankar tord ne ke liye . Oonko Jyoti ke roop mein darshan diye jo Anant thi . Oosi roop ko log aaj tak poojte hain jo shiv hai

    Please read Shiv Puran....... Do not insult GOD.... Nahi to iska parinaam tumko bhugtana hoga........
    HAR HAR MAHADEV

    Dr. shyam gupta said...

    आशीष वर्मा जी....हिन्दी में लिखें तो सही समझ में आये.....शिव पुराण पढकर ही कोई सर्व ज्ञानी नहीं होजाता ..( हमने भी पढ़ रखा है हर पुराण हुज़ूर)..पुराणों के गहन अर्थ होते है उन्हें विश्लेषि किया जाता है समझाने हेतु...आप स्वयं मेरे ब्लॉग पर मेरा आलेख ..शिव के बारे में पढ़िए ..जानकारी होजायागी ...दर्शन व विज्ञान के समन्वय की...जो भारतीय ज्ञान की रीढ़ है ...

    saini said...

    हिंदू धर्म में त्रिदेवों का सर्वाधिक महत्व बताया गया है ब्रह्मा, विष्णु व महेश। इनमें से सिर्फ भगवान शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग रूप में भी पूजा की जाती है। ऐसा क्यों? इस प्रश्न का उत्तर शिवमहापुराण में विस्तृत रूप से दिया गया है, जो इस प्रकार है-

    शिवमहापुराण के अनुसार एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्मरूप होने के कारण निष्कल (निराकार) कहे गए हैं। रूपवान होने के कारण उन्हें सकल(साकार) भी कहा गया है। इसलिए शिव सकल व निष्कल दोनों हैं। उनकी पूजा का आधारभूत लिंग भी निराकार ही है अर्थात शिवलिंग शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है। इसी तरह शिव के सकल या साकार होने के कारण उनकी पूजा का आधारभूत विग्रह साकार प्राप्त होता है अर्थात शिव का साकार विग्रह उनके साकार स्वरूप का प्रतीक होता है।

    सकल और अकल(समस्त अंग-आकार सहित साकार और अंग-आकार से सर्वथा रहित निराकार) रूप होने से ही वे ब्रह्म शब्द कहे जाने वाले परमात्मा हैं। यही कारण है सिर्फ शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनका पूजन निराकार(लिंग) तथा साकार(मूर्ति) दोनों रूप में किया जाता है। भगवान शिव ब्रह्मस्वरूप और निष्कल(निराकार) हैं इसलिए उन्हीं की पूजा में निष्कल लिंग का उपयोग होता है। संपूर्ण वेदों का यही मत है।

    समझ गए बाबू और लेकिन लगता है की भाषा आपकी समझ में नहीं आई होगी और अगर आ भी गई तो भाव समझ नहीं आएगा क्योंकि अगर भाव समझाने की समझ आप में होती तो ये प्रशन ही नहीं करते मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है

    दीपक बाबा said...

    स्त्रीलिंग =
    पुल्लिंग =

    यानी..

    चिन्ह...

    शिवलिंग ...
    यानी
    शिव का चिन्ह...

    बाकि दिमाग आपका... विचार आपके.. जैसा होगा वैसे सोचेंगे.

    Dr. shyam gupta said...

    सैनी जी आपने सही लिखा परन्तु यह ही सम्पूर्ण सत्य नहीं है...अन्य पुराणों में... विष्णु पुराण में विष्णु को, ब्रह्मसहिता में क्रिष्ण को, देवी भागवत में देवी को ही सर्वोपरि एवं परब्रह्म का दर्जा दिया गया है ।.....वैदिक साहित्य में भी शिव से पहले हरि..अर्थात अग्नि,इन्द्र के पश्चात विष्णु का आविर्भाव होता है।
    ---वस्तुतःयह इस प्रकार है...ब्रह्म( अव्यक्त)-->हिरण्यगर्भ(व्यक्त)-->अपरा शक्ति( माया)+पराशक्ति(परात्पर ब्रह्म)--->स्वयंभू आदि शम्भु....शम्भु+अपरा= महत्तत्व--->आदिपुरुष+आदि माया...
    १-आदिपुरुष(अर्थात...आदिविष्णु)--->महाविष्णु+महाशिव+महाब्रहमा..
    २.आदिमाया-->रमा, उमा, सावित्री...
    ३-महाविष्णु+रमा= ब्रह्म अन्ड जिसमें..महाविष्णु के अन्श -->विष्णु चतुर्भुज+लिन्ग महेश्वर(शिव ज्योतिर्लिन्ग)+ब्रह्मा...सब अन्तर्निहित थे । जिससे समस्त श्रिष्टि हुई....
    ---इस प्रकार शिव...आदिशिव ( स्वयंभू शम्भु)भी हैं...आदिपुरुष से उत्पन्न महाशिव भी हैं....महाविष्णु से उद्भूत...लिन्ग महेश्वर भी हैं...अर्थात..अदि-अनादि व पुरुष तीनों रूप ....इसीलिये शिव लिन्ग की पूजा होती है .”न तस्य प्रतिमा अस्ति’..रूप में चिन्ह रूप मेण अनादि लिन्ग, श्रिष्टि का आदि स्वचालित प्रजनन भाव के रूप में,"शिवलिन्ग"...

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ योगेन्द्र पाल ! लेख के आरंभ में ही लिख दिया गया है कि यह लेख ‘दृष्टिकोण‘ ब्लॉग पर एक हिन्दू भाई ने लिखा है। उसे हमने यहां इस आशय से पेश किया है कि सभी बुद्धिजीवी इस लेख पर विचार करें और इस लेख के लेखक की भ्रांति को दूर कर दें।
    ईश्वर और महापुरूष हम सभी के लिए आदरणीय हैं। अगर उनकी प्रशंसा में कोई कुछ कहता है तो अच्छी बात है लेकिन अगर कोई उनकी निंदा करता है तो यह हम सबके लिए सहन करने योग्य नहीं होना चाहिए।
    लेखक की मंशा चाहे अच्छी ही रही हो लेकिन उसका यह लेख एक पक्षीय है। वैदिक साहित्य के आधार पर ही ईश्वर के सच्चे स्वरूप को जाना जा सकता है। लेखक ने ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का परिचय अपने लेख में नहीं दिया है। इस लेख में यह एक बड़ी कमी है। यही वजह है कि हम इस लेख से सहमत नहीं हैं।
    हम चाहते तो इस लेख को नज़र अंदाज़ कर सकते थे लेकिन यह मात्र एक लेख नहीं है बल्कि एक मानसिकता का परिचायक है और इस तरह के लेख इंटरनेट पर सैकड़ों की तादाद में नज़र आते हैं।
    ब्लॉगिंग में बुद्धिजीवी भी हमारे दरम्यान मौजूद हैं। वे ईश्वर और महापुरूषों के पवित्र चरित्र को सबके सामने लाएं ताकि नई नस्ल को धर्म का सच्चा बोध प्राप्त हो और वह ईश्वर प्राप्ति के लिए धर्म के मार्ग पर चल सके।
    ईश्वर के स्वरूप को समझने के लिए सभी बुद्धिजीवियों को एकमन हो कर प्रयास करना चाहिए, चाहे उनकी आस्था किसी भी ग्रन्थ में क्यों न हो !

    Aditya Nath Shukla said...

    परमेश्वर आस्था की विषय वास्तु है ....फल्तूचर्चा की नही ....आदित्य

    Prem Bahadur said...

    अनवर जी,
    हमारे यहाँ निगेटिव विचार करने वालों के लिए कई प्रकार के कहावतें प्रचलित हैं, जैसे - "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरती देखी तिन तैसी।", "अधजल गगरी छलकत जाए", "नीम हकीम खतरे जाल" आदि।
    हिन्दू धर्म में सबसे बड़ी अच्छी बात है कि सभी को अपने ढंग से सोचने का पूर्ण अधिकार है, परंतु सोच मानव कल्याण का होना चाहिए। इसलिए ही हिन्दू धर्म में अनेक सम्प्रदाय हो गये हैं। इसलाम धर्म को भी हम एक सम्प्रदाय के समान ही मानते हैं। वास्तव में हिन्दू धर्म का मूल है सनातन धर्म। जिसमें सभी बातें सनातन सत्य हैं। विदेश में स्वामी विवेकानंद से एक ईसाई ने पूछा, "क्या आप हमें हिन्दू बनाने आये हैं?" स्वामी जी का जवाब था, "नहीं मैं आपको सही ईसाई बनाने आया हूँ।" अर्थात् जो सनातन धर्म में है वही सभी धर्मों के मानने वालों में सत्य है। परंतु सम्प्रदाय मे देश-काल-परिस्थिति के अनुसार अलग से कुछ और विश्वास एवं नियम जोड़े गए हैं। इसी प्रकार हमारे यहाँ निराकार मानने वाले भी हैं और साकार मानने वाले भी हैं। निराकार को ईश्वर मानने के लिए कोई चिन्ह की आवश्यकता नहीं होती। जबकि साकार मानने वालों के लिए अलग-अलग चिन्हों की आवश्यकता होती है। शिव, दुर्गा, सरस्वती, हनुमान आदि देवी-देवताओं को आवश्यकता के अनुसार रूप और चरित्र दिया गया है। ताकि उनकी कथा से लोग सही बात को समझते हुए सीखें और धर्माचरण करें। पर यदि कोई इतना समझदार हो जाए कि हर बात को ही गंदी नजर से देखे, तो उसके लिए भी कह दिया है कि "लघुता से प्रभुता मिलै, प्रभुता से प्रभु दूरी। चींटी शक्कर लै चली, हाथी के सिर धूरी।"

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